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लोमड़ी-व्यक्ति से मास्टर की स्नेहपूर्ण मुलाकातें और मापा तथा बुद्ध राजाओं के साथ उनकी बैठक,11 भागों का भाग 7

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भिक्षुओ, मैं आपको याद दिला दूँ कि आपको गप्पें नहीं मारनी चाहिए। यह आपके नियमों में से एक है। जैसा आपने मेरे साथ किया, किसी को नीचा दिखाने के लिए असत्य बातें न कहें। चुगली करनी भी हो, तो पहले जाँच लें कि ये सारी बातें सच हैं या नहीं। जानबूझकर झूठ बोलना तो और भी बुरा है। आप जानते हैं, नरक में आपकी जीभ काट दी जाएगी। बुद्ध ने बताया है कि नियमों का सदाचारपूर्वक पालन न करने वालों को नरक में कैसे दंड मिलता है—अभी संत बनना तो दूर, पहले अच्छा इंसान बनें। सामनी जनों के केवल पाँच नियमों में से भी आपने लगभग सभी का उल्लंघन किया है। […] इसलिए कृपया सावधान रहें। मेरे बारे में चुगली न करें। सच कहूँ तो अब मुझे अपनी प्रतिष्ठा की परवाह नहीं, क्योंकि मैं इतने सारे भिक्षुओं और आमजनों से नहीं लड़ सकती। लेकिन इससे आपके देश, औलेक (वियतनाम), का भी दुर्भाग्य होता है। समझे? हर बुरी बात आपके लिए बुरी होगी, और आपके संबंधियों के लिए बुरी, आपके मित्रों के लिए, परिवार और देश के लिए बुरी होगी। […]

भिक्षु होने के नाते सबसे बढ़कर आपमें करुणा होनी चाहिए। आप केवल मनोरंजन के लिए मेरा भौतिक रूप का भी अपमान करते हैं, ताकि लोग सोचें कि मैं ऐसी-वैसी और न जाने कैसी हूँ। आपको ऐसा क्यों करना है? अपनी प्रतिभा, अपनी वाक्पटुता और बौद्ध धर्म के अपने ज्ञान का उपयोग करें, भले वह केवल सूत्रों से मिला हो, यह तो कहना ही क्या कि आपको बिल्कुल भी आत्मज्ञान नहीं हुआ है। वरना आप मेरे बारे में चुगली जैसा काम नहीं करते, क्योंकि मैं बहुत अच्छी इंसान हूँ—चाहे मैं बुद्ध हूँ या नहीं, आत्मज्ञानी हूँ या नहीं। मैं बहुत अच्छी इंसान हूँ। मैंने जीवनभर, लोगों और पशु-जनों की सहायता की है, मंदिर बनवाने में मदद की है और उस पल या इस पल ज़रूरत के समय भिक्षुणियों या भिक्षुओं को आर्थिक या अन्य सहायता दी है।

मैंने कभी आपको, आपके मंदिर या आपकी प्रतिष्ठा को कोई हानि नहीं पहुँचाई। मुझे तो आपका नाम तक नहीं मालूम था। आपमें से बहुतों को मैं जानती तक नहीं थी। मैं आपको कभी नहीं जानती थी। मैंने जीवन में कभी किसी भिक्षु को गले लगाकर नहीं कहा, “मैं आपसे प्रेम करती हूँ।” मुझे इसमें कुछ गलत नहीं लगता। यदि मैं सचमुच किसी से प्रेम करती, तो उसे, शिशुओं या बच्चों को गले लगाती। और मैं अपने शिष्यों के साथ ऐसा कई बार करती हूँ। यदि कोई अच्छा हो, मुझे उसमें प्रेम और दया दिखे, या उसने समाज के लिए कुछ अच्छा किया हो, तो मैं उसे सबके सामने गले लगाती हूँ। मैं बेघर या निर्धन लोगों को भी गले लगाती हूँ। यदि वे निर्धन और असहाय हों, या उनका हाथ टूटा हो अथवा ऐसी कोई बात हो, तो मैं अवश्य उन्हें गले लगाकर कहूँगी, “मैं आपसे प्रेम करती हूँ।” लेकिन किसी भिक्षु के साथ मैंने ऐसा कभी नहीं किया। क्योंकि मैं भिक्षुओं के नियम जानती हूँ। उन्हें किसी स्त्री के निकट भी नहीं जाना चाहिए; गले लगाने और “मैं आपसे प्रेम करती हूँ” कहने जैसी बातों का तो प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसी बातें करके आप स्वयं ही अपनी पोल खोलते हैं और लोगों को बताते हैं कि आप सच्चे भिक्षु नहीं हैं।

विशेषकर जब मैं आपको जानती तक नहीं। मैं आपको कभी नहीं जानती थी। और यदि मैंने आपको गले लगाया भी, यदि यह हो भी, ओह, मुझे नहीं पता, 10,000 अरबों बार, उन समय में एक बार, मैंने आपको गला लगाया, एक बार मैंने आपको गले लगाया या कहा, “मैं आपसे प्रेम करती हूँ,” तो इसका अर्थ है कि मैं आपके प्रति अच्छी हूँ, आपसे प्रेम करती हूँ। फिर आप मेरे बारे में बुरा क्यों बोलेंगे, झूठी चुगली और निंदा क्यों करेंगे, ताकि लोग मुझे बुरा समझें या मेरे शिष्यों का मुझ पर विश्वास घट जाए अथवा वे मुझे छोड़ दें? यह मेरे बारे में चुगली करने और झूठ बोलने के पाप से भी बुरा है। यह इसलिए अधिक बुरा है क्योंकि बौद्ध धर्म में संघ को तोड़ना सबसे घोर पापों में से एक है—माता-पिता की हत्या करने या बुद्ध को मारने अथवा हानि पहुँचाने जितना घोर। आप यह जानते हैं। यदि नहीं जानते, तो मेरी सलाह है कि अपना चोगा उतार दें। बौद्ध श्रद्धालुओं को और धोखा न दें और अपने ऊपर अनंत नरक का कर्म लगातार न लादें।

इस पर विचार करें। सूत्रों को फिर से पढ़ें और केवल मेरे साथ ही नहीं, किसी के साथ भी ऐसा करने से बचें। मेरे साथ तो आप ऐसा कर ही चुके हैं। अब बहुत देर हो चुकी है। मुझे नहीं पता कि आप पश्चात्ताप करके इस पाप से मुक्त हो सकते हैं या नहीं। यदि मैं आपको क्षमा कर दूँ, और सदा क्षमा करती रहूँ या आपकी सहायता भी करना चाहूँ, तब भी नहीं जानती कि मुझे इसकी अनुमति है या नहीं। सामान्यजन, ओलासिस (वियतनामी) अभी भी असुरक्षित हैं। वे सभी आत्मज्ञानी नहीं हैं। यदि वे आप जैसे भिक्षुओं का अनुसरण करेंगे, तो कभी आत्मज्ञानी नहीं होंगे। इसलिए यदि वे मुझे डाँटते, मेरी निंदा या किसी भी तरह मेरा अपमान करते हैं, तो मैं समझ सकती हूँ। मैं उन्हें क्षमा करती हूँ और उनके पाप के लिए प्रार्थना करती हूँ। लेकिन आपको तो गुरु होना चाहिए। भिक्षु बनते ही सभी आपको गुरु कहते हैं, चाहे आपको भिक्षु बने कितना भी समय हुआ हो। केवल सिर मुँडाते ही लोग आपका सम्मान करते और आपको दान व भेंट देते हैं। वे आपके सामने झुकते हैं। वे आपको साष्टांग प्रणाम करते हैं। और आपका आचरण ऐसा है?

इस पर विचार करें। अपने लिए और नरक मत रचिए—वह अनंत, अविराम नरक जिसका उल्लेख बौद्ध सूत्रों में है। बुद्ध ने इसका कई बार उल्लेख किया है। आपको यह याद रखना चाहिए। केवल चोगा पहनकर बौद्ध सूत्रों से अनभिज्ञ न रहें। यह आपको बुद्ध-लोक नहीं, नरक में ले जाएगा। मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ। और मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर तथा सभी बुद्धों की शपथ लेकर कहती हूँ कि मैं आपको सत्य बता रही हूँ। इसलिए सावधान रहें। सावधान रहें, आप धर्मगुरु हैं। अपना आचरण बदलकर सच्चे धर्मगुरु बनें और अपने सभी अनुयायियों की शरण बनें। “कचरा” न बनें। एक “कचरा।” कचरा, शरण से अलग होता है। मेरी कामना है कि आप बदलें और जिस भी प्रकार संभव हो, आत्मज्ञान प्राप्त करें। नरक को याद रखें, ताकि उसमें न गिरें, स्वयं को बदलें और सचमुच अच्छे भिक्षु बनें। बुद्ध आपको आशीर्वाद दें।

परमेश्वर की मेरी सभी प्रिय संतानों, परमेश्वर के शिष्यों, मुझे नहीं पता कि कितने गैर-शिष्य हमारा टीवी देखेंगे—अर्थात इसे देखेंगे—यदि हम इसे कभी फ़्लाई-इन न्यूज़ में प्रसारित करें, लेकिन मुझे विश्वास है कि आप सब समझते और निश्चित रूप से जानते हैं कि मैंने आपको पूरा सत्य बताया है। बस, मुझे लगा कि आपके लिए उस जुगनू के बारे में जानना रोचक होगा, जिसने मेरी युवावस्था को तुच्छ समझते हुए कहा कि नकारात्मक शक्ति से लड़ने के लिए मैं “बहुत बूढ़ी” हूँ। मैं बस हँस पड़ी और मुझे बहुत मनोरंजक लगा। मैं उससे कभी नाराज़ नहीं हुई। वह थोड़ी देर रुकी और फिर चली गई। कुछ समय बाद मैंने उससे पूछा, “ओह, तुम कहाँ हो?” उसने कहा कि अब वह बहुत दूर है। तब तीन घंटे बीत चुके थे। लेकिन मैंने पूछा, “तुम कितनी दूर हो?” उसने कहा, मुझसे, मेरे तंबू से लगभग 200 मीटर दूर। हे भगवान, 200मीटर तय करने में उसे तीन घंटे लगे। और वह अपने साथी को खोजने के लिए आगे बढ़ रही थी। मैं आपको पहले ही बता चुकी हूँ।

पशु-जन, यहाँ तक कि कीट होना भी कितना कष्टमय जीवन है। और हम सोचते थे कि हम मनुष्यों का जीवन पहले ही बहुत जटिल और कष्टों से भरा है। इसलिए बेहतर है कि हमारा पतन न हो। दीक्षा के समय सिखाई गई क्वान यिन पद्धति का अभ्यास करें। कम-से-कम अच्छे इंसान बनें। पाँच नियमों का पालन करें। इसी तरह आप सदा अच्छे इंसान बने रह सकते हैं। और यदि आपको फिर मनुष्य बनकर लौटना पड़े, तो आप मनुष्य ही बन सकते हैं। आपको विकास-क्रम में नीचे नहीं जाना पड़ेगा, बल्कि आप केवल ऊपर उठेंगे। तब आपका जीवन सुख-सुविधापूर्ण और समृद्ध होगा। निस्संदेह, यह जन्म-जन्मांतर और इस जीवन के आपके पुण्यों पर भी निर्भर करता है। सबसे अच्छा है कि आप खुद को इन सबसे, इन सबसे मुक्त कर लें। मुक्त, हर चीज़ से मुक्त– भाग्य से, दुर्भाग्य से, प्रसिद्धि से, बुरे और अच्छे से, हर चीज़ से – मुक्त, खुद को इन सबसे मुक्त कर लें। जब तक इस संसार में हैं, यहाँ की किसी भी वस्तु को बहुमूल्य न समझें। तब आप सदा के लिए मुक्त हो जाएँगे। और दूसरों को भी मुक्त होने में सहायता कर सकेंगे, जैसे मैं अभी कर रही हूँ। मुझे थोड़ा पानी पी लेने दें। मैं वापस आती हूँ।

हाल ही में, मेरा एक श्वान-जन अचानक बहुत बीमार हो गया। मैं न तो उसे चिकित्सक के पास ले जा सकी, न स्वयं उसे दवा दे सकी। वह अभी मेरे साथ नहीं है। स्वर्ग ने मुझे बताया कि यह नकारात्मक शक्ति का काम है, जो मुझे पीड़ा देने के लिए मेरे श्वान-जन का उपयोग कर रही है। शारीरिक रूप से न सही, लेकिन... मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि मुझे उसका कर्म अपने ऊपर लेने दें, लेकिन इसकी अनुमति नहीं मिली, क्योंकि यह मेरे लिए बहुत अच्छा होता। अब तक, विशेषकर हाल के वर्षों में, मुझे ऐसी कोई भी चीज़ रखने की अनुमति नहीं है जिससे मुझे आनंद या प्रसन्नता मिले। जैसे श्वान-जनों या पक्षी-जनों का मेरे साथ रहना, अथवा दल के किसी अच्छे सदस्य का मेरे साथ रहना—ऐसी बातें। या स्वादिष्ट भोजन का स्वाद भी, कभी-कभार। वही भोजन खाकर आप कहेंगे, “वाह, यह तो स्वर्ग है।” मेरे लिए, वह घास जैसा फीका होता है, या बस थोड़ा नमकीन अथवा मीठा- लगता है—इससे अधिक कुछ नहीं, न ही स्वादिष्ट, न आनंददायक। मैं केवल खाती हूँ क्योंकि जानती हूँ मुझे खाना है। मेरे लिए भोजन करना भी मानो संसार से जुड़े रहने का एक माध्यम है। मैं यह पहले ही समझा चुकी हूँ। लेकिन इस समय इस स्थान पर रहकर मुझे प्रसन्नता है, क्योंकि यह अत्यंत आशीषित वन है और जहाँ मैंने अपना तंबू लगाया है, वह बहुत आशीषित स्थान—एक अत्यंत आध्यात्मिक निधि—है।

Photo Caption: "अच्छे दिखने का मतलब हमेशा असली अच्छी गुणवत्ता नहीं होता है!"

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