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प्रतिलिपि
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लोमड़ी-व्यक्ति से मास्टर की स्नेहपूर्ण मुलाकातें और मापा तथा बुद्ध राजाओं के साथ उनकी बैठक,11 भागों का भाग 5

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हर दिन मैं केवल अगले 24घंटों की बात पूछती हूँ, क्योंकि टेलीविज़न के काम, व्यवसाय और संपर्क में रहने वाले, अधिकतर आंतरिक टीम के सदस्यों की देखभाल के साथ मैं इतना ही संभाल सकती हूँ। क्योंकि उनका शरीर भी इंसानी ही है—मांस, कोमल और नाज़ुक—और कभी-कभी उन्हें परेशानी होती है। हो सकता है अचानक तबीयत बिगड़ जाए अकस्मात यात्रा या किसी कारण उनके पैर की उँगली या पैर में चोट लग जाए। तब मुझे उनसे बात करके यह भी बताना पड़ता है कि क्या करना चाहिए, क्योंकि कभी-कभी वे बहुत व्यस्त होते हैं। मुझे नहीं लगता कि उन्हें ऐसा करना चाहिए, पर दर्द या तकलीफ़ को लंबे समय तक टालना सुरक्षित नहीं है। हमें तुरंत इसका उपचार करना चाहिए। और इसका उपचार कैसे करना है, वह भी निर्भर करता है। उन्हें मुझसे बात करना और सलाह माँगना अच्छा लगता है। इसलिए कभी-कभी मुझे घंटों उनके साथ बात करने, उन्हें सांत्वना देने और ऐसी दूसरी बातों में समय देना पड़ता है। और एक बात से दूसरी बात निकलती जाती है। कभी-कभी हम इस तरह बातचीत भी करते हैं, ताकि उन्हें बेहतर महसूस हो। और यह अधिक निकटता से, खुलकर और सहज होकर बात करने का अवसर भी होता है। इससे उनकी कार्य-ऊर्जा और टीम के सदस्यों के रूप में आपसी संबंधों को भी लाभ होता है।

एक क्षण, मुझे याद करने दीजिए। क्योंकि वे सोच सकते हैं कि यह छोटी-सी बात है और ठीक हो जाएगी, पर हमेशा ऐसा नहीं होता। जैसे मेरे मामले में, कुछ दिन पहले या शायद एक सप्ताह पहले मैं बुरी तरह गिर गई थी; अब मुझे ठीक से याद नहीं। और मापा तथा ट्रिनिटी ने कई घंटों तक मुझे स्वस्थ करने में बहुत सहायता की। और मैं ठीक हूँ। शायद मुझे मस्तिष्काघात या ऐसी कोई चोट नहीं लगी। बस सिरदर्द अब भी बना हुआ है, हालाँकि मैं ठीक हूँ। मैं अब भी हमेशा की तरह काम और बाकी सब करती हूँ। बस कभी-कभी थोड़ा सिरदर्द होता है।

और आज सिरदर्द पिछले कई दिनों से अधिक है, जब यह बिल्कुल नहीं था। शायद यह गिरने की उसी घटना के कारण है। वह सचमुच बहुत ज़ोरदार धक्का था। ज़ोरदार धक्के का अर्थ यह नहीं कि केवल एक व्यक्ति ने धक्का दिया। यह एक बड़ा गिरोह है। ये नकारात्मक शक्तियाँ मुझसे छुटकारा पाने के लिए सचमुच कुछ भी करेंगी, पर मैंने उनसे कहा, “जंगली घास कभी नहीं मरती।” यह जर्मन कहावत है। इसका अर्थ है, “जंगली घास मरती नहीं।” यह सच भी है। आप घास काटते हैं या कभी-कभी उसकी सारी जड़ें खोदकर निकाल देते हैं। कुछ दिनों बाद, विशेषकर थोड़ी बारिश होने पर, वह फिर उग आती है—हरी-भरी, मज़बूत और शक्तिशाली। इसलिए मैंने उनसे कहा, “मैं जंगली से भी जंगली घास हूँ। मैं एक ‘बेकार’ वाली हूँ। इसलिए मुझे कोई नहीं मार सकता। मैं जीवित रहूँगी।” पर वे हमेशा प्रयास करते रहते हैं। या तो वे मुझे चोट पहुँचाने की कोशिश करते हैं... दूर से भी। वाह, यह नकारात्मक शक्ति कितनी प्रबल है। इसीलिए वे मनुष्यों की पूरी जाति, पशु-जनों, अन्य प्राणियों, सभी चुड़ैलों और ऐसी दूसरी शक्तियों को नियंत्रित कर सके। और इसी कारण वे हज़ारों-हज़ार वर्षों से अब तक पृथ्वी को नियंत्रित कर सके।

उससे पहले, हमारी स्थिति बेहतर थी। हम ठीक थे। फिर उन्होंने इस संसार पर अधिकार करके इसे अपना बनाना चाहा, और अब वे हमारे लोगों को अलग-अलग तरीकों से मार रहे हैं। और जब वे मुझे सीधे छू नहीं पाते, तो मेरे शिष्यों के माध्यम से मुझे परेशान करते हैं, यहाँ तक कि मेरे श्वान-जनों का भी उपयोग करते हैं; क्योंकि अपने श्वान-जन को बीमार और असहाय देखने या अपने तथाकथित शिष्यों को इन सत्ताओं से प्रताड़ित होते हुए जानने के बजाय मैं स्वयं दर्द सहना पसंद करूँगी। वे दुष्ट हैं; वे क्रूर हैं। और मेरे सभी तथाकथित शिष्य, यहाँ तक कि टीम के सभी सदस्य भी, इतने उच्च स्तर पर नहीं हैं कि नकारात्मक शक्ति की पहुँच से बाहर हों। साथ ही, उनके वर्तमान जीवन का कर्म भी कभी-कभी आकर उन्हें परेशान करता है, और तब मुझे भी उसमें शामिल होना पड़ता है। मैं कुछ कर्म ले सकती हूँ, पूरा नहीं। इस तरह करने की अनुमति नहीं है। इस भौतिक संसार में यह इस प्रकार काम नहीं करता। इसलिए मैं कुछ कर्म लेती हूँ, पर जब इधर-उधर की बहुत-सी छोटी बातें और बहुत-सा थोड़ा-थोड़ा कर्म इकट्ठा हो जाता है, तो उसका शरीर पर भी प्रभाव पड़ता है। मैं लोहे की नहीं बनी हूँ। आपकी ही तरह मैं भी मांस और हड्डियों से बनी हूँ।

ठीक है, परमेश्वर के मेरे प्रिय सुंदर शिष्यो, परमेश्वर के शिष्यो, अब मुझे लगता है कि लोमड़ी-जन के आने का कारण शायद कुछ दिन या कुछ सप्ताह पहले हुआ वह सम्मेलन था। मैंने एक फ़्लाई-इन न्यूज़ में बताया था कि मुझे अब एक सम्मेलन में जाना है। बुद्ध राजा से भेंट के तुरंत बाद मुझे मापा और कुछ बुद्ध राजाओं के साथ एक निजी सम्मेलन करना पड़ा। यह संसार या ऐसी किसी बात के बारे में नहीं था। यह बस, मेरे लिए था। इस बार सब कुछ केवल मेरे बारे में था। मुझे आश्चर्य हुआ। मुझे पहले से नहीं बताया गया था कि सम्मेलन कैसा होगा और उसमें किस विषय पर चर्चा होगी। मुझे इसका पता इसके दौरान और उसके बाद ही चला। इसलिए उन्होंने मेरी सुरक्षा पर चर्चा की और कहा कि मुझे सुरक्षित रहने के लिए इलेक्ट्रॉनिक साधन का उपयोग करना होगा। बुद्ध राजा ने कहा, “सुरक्षा सबसे पहले।” अभी मेरे पास वे टिप्पणियाँ नहीं हैं, इसलिए मैं उन्हें बाद में आपको पढ़कर सुनाऊँगी।

मैं अब भी हिचकिचा रही हूँ, पर शायद उसका 90 प्रतिशत आपको पढ़कर सुनाऊँगी, ताकि आपको भी कुछ जानकारी हो। वैसे आपको आंतरिक अनुभव तो होते हैं, पर वह आपके पास नहीं है, जो मेरे पास है। इसलिए शायद आप कई बार मुझसे मेरी डायरी और ऐसी चीज़ें माँगते हैं, या पूछते हैं कि मैंने क्या किया, और मैं हमेशा आपको सब कुछ नहीं बताती। मैंने नहीं बताया। इसलिए हाल में मुझे लगा कि जो कुछ बता सकती हूँ, उसमें से कम-से-कम थोड़ा आपको बताना चाहिए, ताकि आप भी कुछ सीखें। आपको यह भी पता चले कि मेरे जीवन में क्या-क्या होता है, मुझे कौन-से कार्य करने पड़ते हैं या मैं क्या कर सकती हूँ, अथवा मैंने शांति की कोई छोटी लड़ाई जीती है और कुछ देश युद्ध से मुक्त हुए हैं—ऐसी बातें। पर मैं आपको सारा विवरण नहीं बता सकती, क्योंकि युद्ध तो युद्ध होता है; भौतिक हो या सूक्ष्म, दोनों एक जैसे हैं। आप स्वयं इसकी कल्पना कर सकते हैं। वरना, कौन किसे मार रहा था, यह बताते हुए मेरा बहुत समय व्यर्थ हो जाएगा।

हमारा एक नियम है कि हत्या नहीं करनी चाहिए। पर मनुष्यों की रक्षा करने और इस ग्रह को जीवित रखने के लिए कुछ शैतानों का अंत करना आवश्यक है, क्योंकि वे नकारात्मक शक्ति के लिए काम करते हैं और वे मनुष्यों को मार रहे हैं, या उन्हें अपंग कर रहे हैं, या मुझे लगता है उन्हें नशीले पदार्थ देते या अनेक तरीकों से नियंत्रित करते हैं, ताकि वे परमेश्वर को याद तक न कर सकें। वे कभी-कभार भी प्रार्थना नहीं करते। उन्हें प्रार्थना करना भी नहीं आता, और वे कभी गिरजाघर, मंदिर, मस्जिद या किसी अन्य धार्मिक संस्थान में भी नहीं जाते, जिन्हें अलग-अलग नाम दिए गए हैं। जैसे यहूदियों के उपासना-गृह। आप जानते हैं, हर धर्म में उपासना-स्थल बनाए जाते हैं, पर भाषाएँ अलग होने के कारण उनके नाम भी अलग होते हैं। बस इतनी-सी बात है। जैसे ईसाई धर्म में सामूहिक प्रार्थना-स्थल को गिरजाघर कहते हैं। और बौद्ध उस भवन को मंदिर कहते हैं। और मुसलमान उस पवित्र स्थान को, जहाँ वे एकत्र होकर परमेश्वर की उपासना करते हैं, मस्जिद कहते हैं। उदाहरण के लिए, ऐसे।

और हमारा अपना मंदिर भी है। यह वह पवित्र शरीर है, जिसमें पवित्र आत्मा निवास करती है। इसलिए बाइबल में लिखा है, “क्या आप नहीं जानते कि आप परमेश्वर के मंदिर हो और पवित्र आत्मा आपके भीतर निवास करती है?” या, “परमेश्वर का साम्राज्य आपके भीतर है।” इसलिए अब हमें इस मंदिर की भी देखभाल करनी चाहिए और यदि यह अब तक शुद्ध नहीं हुआ है, तो इसे शुद्ध करना चाहिए: सबसे पहले तुरंत वीगन बनें, ताकि अपने भीतर के परमेश्वर का साम्राज्य को फिर प्राप्त कर सकें। आपके ऊपर, आसपास, भीतर और बाहर जमा सारा कचरा साफ़ कर दें। स्वयं को फिर से परमेश्वर का मंदिर बनाएँ—शुद्ध, उचित, सक्षम और पवित्र।

बोलते समय मैं भूल भी जाती हूँ, क्योंकि मेरे पास कोई लिखित आलेख नहीं होता। मेरे पास कभी कोई लिखित आलेख नहीं होता। विशेषकर परमेश्वर या बुद्ध राजा से बात करते समय। मुझे कभी पता नहीं होता कि वे मुझसे क्या कहने वाले हैं, तो मैं उसका आलेख कैसे लिख सकती हूँ? वैसे भी मुझे कभी किसी आलेख की आवश्यकता नहीं पड़ी। परमेश्वर की कृपा और परमेश्वर की इच्छा से यह कार्य सँभालने के बाद से मैंने बोलने के लिए कभी कोई आलेख नहीं लिखा। अधिकतर मैं बस वहाँ बैठती हूँ। मेरे सामने कुछ नहीं होता और मैं कुछ देखकर नहीं बोलती। मैं बस बोलती हूँ, क्योंकि वाणी सीधे परमेश्वर से आती है। यदि बोलने में या किसी और बात में कोई त्रुटि होती है, तो वह मेरी मानवीय सीमाओं के कारण होती है; परमेश्वर कभी कोई त्रुटि नहीं करते। हम मनुष्य बोलते समय कभी-कभी गलतियाँ करते हैं। यहाँ तक कि हम पढ़ते या कुछ सुनते समय भी हम इसे गलत समझ लेते हैं और उसे गलत दोहराते हैं। इसी कारण इस संसार में बहुत-सी परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं।

पर मैं ऐसी कोई गंभीर गलती नहीं करती। हाँ, चूँकि मेरी मातृभाषा अंग्रेज़ी नहीं है, इसलिए जिन शब्दों का मैंने कभी उपयोग नहीं किया, वे अचानक निकल सकते हैं और संभव है कि मैं उनका उच्चारण गलत कर दूँ। पर वह केवल छोटी-सी गलती होती है। कुछ लोग आकाश में चमकने वाले “सन” यानी सूर्य के बजाय “सन” यानी पुत्र कह देते हैं। कभी-कभी वे केवल किसी को छेड़ने के लिए मज़ाक करते हैं। वे कहते हैं, “आप मेरे पुत्र हो।” इसका अर्थ मेरे सूर्य होता है, क्योंकि दोनों शब्दों का उच्चारण मिलता-जुलता है। और कुछ शब्द मैंने पहले कभी इस्तेमाल नहीं किए, इसलिए संभव है कि मैं उन्हें भूल गई होऊँ। बस इतना ही—कोई बड़ी समस्या गलती नहीं।

अब, पहले परमेश्वर और कुछ बुद्ध राजाओं के साथ हुई बातचीत, बैठक और सम्मेलन के कारण... मैं पहले अपनी बात आगे बढ़ाना भूल गई थी, इसलिए अब जारी रखती हूँ। वन में मेरी सुरक्षा का उल्लेख हुआ था, इसलिए तब से मैं थोड़ी अधिक सतर्क हो गई हूँ। वास्तव में, अधिकतर मैं कहीं भी दस मीटर से ज़्यादा दूर नहीं जाती, टहलने या किसी और काम के लिए भी नहीं। इसलिए वास्तव में मैं अधिकतर सुरक्षित रहती हूँ। वहाँ बड़े पशु-जन हैं, जैसे बड़े हिरण-जन और उनसे भी विशाल जीव, पर पशु-जन मेरे प्रति बहुत सौम्य हैं। वे शायद मेरी ओर देखते हैं या दो-एक बार सिर झुकाते हैं और फिर चले जाते हैं। कोई समस्या नहीं। पर उस सम्मेलन के बाद से मैं अपने आसपास के वातावरण के प्रति कुछ अधिक सजग हो गई हूँ। इसलिए मैं अधिक ध्यान देती हूँ।

Photo Caption: "प्रकृति की नक़ल करना कठिन है"

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