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बुद्ध धर्म और ईसाई धर्म के बीच का अंतर, 15 का भाग 8: प्रश्न और उत्तर

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इस एपिसोड में, सुप्रीम मास्टर चिंग हाई आंतरिक दिव्य प्रकाश और ध्वनि के मार्ग पर प्रकाश डालती हैं और एक सच्चे मास्टर को पहचानने के लिए सुझाव देती हैं।

(मैं देर से आया और मुझे नहीं पता कि आपने इसका जवाब पहले ही दे दिया होगा या नहीं। लेकिन, फिर भी मैं यह सवाल पूछना चाहता हूँ। क्या आप संत मत या सूरत शब्द योग के बारे में जानते हैं?) हां, हां, मुझे पता है।

(आप जो सिखा रहें है उसकी तुलना में यह कैसा है, और इस पर आपकी क्या राय है?)

शायद मिलते-जुलते हों। मेरे व्याख्यानों में यह अधिक विस्तृत होता है, ज्ञान और व्याख्या दोनों ही अधिक व्यापक होते हैं। (तो क्या आप यह कह रहे हैं कि आप भी वही चीज सिखा रहे हैं?) मुझे ऐसा लगता है, हाँ। (अच्छा। क्या आपकी पुस्तकों में इसका और अधिक विवरण दिया गया है, जो मुझे मिल सकती हैं?) अरे नहीं, उसमें इसका जिक्र नहीं है। क्योंकि [क्वान यिन] पद्धति, आप समझा नहीं सकते, आप इसे केवल मौन के माध्यम से ही संप्रेषित कर सकते हैं। तो मैं जो समझाती हूं वह केवल एक प्रकार का दर्शन है। (तो, आपकी ध्यान की पद्धति में आंतरिक (स्वर्गीय) प्रकाश और आंतरिक (स्वर्गीय) ध्वनि शामिल है?) सही। (अच्छा। धन्यवाद।)

(किंतु, क्षमा करें, यह [सुप्रीम] मास्टर चिंग हाई के साथ सुरक्षित भी है, और अधिक शक्तिशाली।) (क्या ये शिव दयाल सिंह की परंपरा के भारतीय मास्टरों से भी अधिक शक्तिशाली हैं?) नहीं, हमें इस तरह की बातें नहीं कहनी चाहिए। (अच्छा।)

देखिए, हम किसी भी चीज की तुलना करने की कोशिश नहीं करते, क्योंकि लोगों की विभिन्न मास्टरों के प्रति विभिन्न आत्मियता होती हैं। यदि आपको लगता है कि संत मत आपको आकर्षित करता है, तो वही सही मार्ग है। अगर आपको लगता है कि मैं आपको ज़्यादा आकर्षक लगती हूँ, तो इसका मतलब है कि आप मुझसे ज़्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं।

(आपका वंश क्या है?) आपका मास्टर कौन है और आपके मास्टर का मास्टर कौन है, इत्यादि? यह हिमालय में है। यह वंश किसी एक व्यक्ति से नहीं आता है। यह ईश्वर से आता है। और यह विभिन्न चैनलों से होकर गुजरता है।

(क्या आपकी राय में पृथ्वी पर एक समय में केवल एक ही मास्टर होता है, या बहुत हो सकते हैं?) बहुत। धन्यवाद।

क्योंकि देशों तो बहुत सारे हैं। एक मास्टर सभी लोगों की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता। (जी हाँ।) साथ ही, भौतिक शरीर की भी एक सीमा होती है। इसलिए जब बुद्ध जीवित थे, तब उनके साथ एक और मास्टर थे। कभी-कभी कई होते हैं, कभी-कभी अधिक होते हैं, यह समय की आवश्यकता पर निर्भर करता है। लेकिन कभी-कभी एक मास्टर इतना प्रसिद्ध हो जाता है कि दूसरा मास्टर उनकी छाया में दब जाता है या अधिक अच्छे से स्थापित। बस इतना ही। उदाहरण के लिए, अब हर कोई बुद्ध के बारे में जानता है, क्योंकि वे 2600 साल पहले से स्थापित हैं। सभी प्रभु मसीह के बारे में जानते हैं। फिर, बाकी सभी लोग उनकी छायाओ में आ जाते हैं। तो, कई दशकों से संत मत स्थापित हुआ है, गुरु नानक के समय से या ऐसा कुछ, लगभग 500 साल पहले। बेशक, वे अधिक स्थापित और प्रसिद्ध हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि केवल वही एक वंश मौजूद है। अन्यथा, बुद्ध को वह वंश परंपरा कहाँ से मिली? और इन सभी चीनी मास्टरों, जापानी मास्टरों आदि को यह ज्ञान कहाँ से मिला? इस समय, सामान्य से अधिक मास्टरों रहे हैं, ‌- इस समय। अन्य समयों में, शायद केवल एक, दो या तीन। इस समय वे और भी अधिक हैं।

(विभिन्न मास्टरों के बीच कोइ कैसे प्रभेद कर सकता है?) क्या मास्टरों के विभिन्न दर्जे होते हैं? उसी पथ पर या किसी अलग पथ पर? (विभिन्न पाथों।) ओह। (कोइ यह कैसे तय कर सकता है कि कौन है वह?) कौन है वह? (हाँ।) जी हाँ। क्या आप संत मत का पालन कर रहे हैं? (मुझे होनोलूलू में दीक्षा दी गई थी।) किसके साथ? (दर्शन सिंह)

ओह हां। आपके मास्टर किरपाल सिंह आपको बताएंगे कि ईश्वर तक पहुंचने के अनेक मार्ग हैं, लेकिन (आंतरिक दिव्य) प्रकाश और (आंतरिक दिव्य) ध्वनि का मार्ग सबसे सुरक्षित है, उन्होंने नहीं कहा कि यह एकमात्र है। (क्या आप यह कह रहे हैं कि उन्होंने यह नहीं कहा कि यही एकमात्र पथ है?) नहीं, उन्होंने ऐसा नहीं कहा। उन्होंने कहा, “सबसे सुरक्षित, सबसे तेज़, (हाँ, बिल्कुल।) और सबसे अच्छा।" हाँ। खैर, मैं भी यही कहूंगा। लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि यही एकमात्र है। कभी-कभी ईश्वर के प्रति गहरी लगन, ईमानदारी, या कई जन्मों की भक्ति के माध्यम से भी उन्हें फल की कमाइ हो जाती है। हमारा तात्पर्य यह है कि इस (आंतरिक दिव्य) प्रकाश और (आंतरिक दिव्य) ध्वनि के संपर्क में आए बिना आप ईश्वर तक नहीं पहुंच सकते। लेकिन यह कोई विधि नहीं है। क्योंकि यह वास्तव में कोई विधि नहीं है। यह बस आंतरिक दिव्य प्रकाश और आंतरिक दिव्य ध्वनि से संपर्क कैसे स्थापित करना है। और आप (आंतरिक दिव्य) प्रकाश और (आंतरिक दिव्य) ध्वनि में प्रवेश करने का कोई भी प्रयास करें – और बस इतना ही! आप प्रबुद्ध हैं। लेकिन यदि आपका कोई ऐसा मास्टर है, जो पहले से ही (आंतरिक दिव्य) प्रकाश और (आंतरिक दिव्य) ध्वनि से जुड़ा हुआ है, वह आपकी जल्दी मदद करता है। बस इतना ही।

यह वास्तव में कोई विधि नहीं है, बल्कि केवल ईश्वरीय शक्ति, और तड़प और भक्ति है। और क्योंकि एक मास्टर के भीतर गहरी तड़प, गहरी भक्ति और महान सद्गुण होते हैं, अतः यह एक झटके की तरह आता है और फिर आप खुल जाते हैं। लेकिन आपको असल में एहसास नहीं होता, इसका मतलब बस भीतर में एक बहुत खामोश सदमा होता है। यदि आप यह सब स्वयं करने का प्रयास करते हैं, तो (आंतरिक दिव्य) प्रकाश और (आंतरिक दिव्य) ध्वनि से संपर्क स्थापित करना कठिन हो जाता है। बस इतना ही।

अतः जो कोई भी इस (आंतरिक दिव्य) प्रकाश और (आंतरिक दिव्य) ध्वनि के संपर्क में आता है, और जो ईश्वर के प्रति बहुत समर्पित होता है, कुछ समय बाद वे मास्टरों बन जाते हैं। और फिर वे इसे दूसरों तक संप्रेषित कर सकते हैं। क्योंकि उनके भीतर अब प्रचुर मात्रा में (आंतरिक स्वर्गीय) प्रकाश और प्रचुर मात्रा में (आंतरिक स्वर्गीय) ध्वनि मौजूद है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए आपके पास बहुत सारा पैसा है, तो आप लोगों को दे सकते हैं। समझ गये? (समझे।)

(मुझे मूल रूप से उनके कहे हुए शब्दों से संबंधित एक प्रश्न है। और पहला सवाल मूल रूप से इस बारे में है कि मास्टर के चयन का मानदंड क्या है? क्योंकि जैसा कि आपने कहा, अब बहुत से मास्टरों हैं, लेकिन बहुत से नकली वाले भी हैं।) हाँ। (और, आप अखबार खोलकर देखिए, आपको उसमें मास्टरों के कई विज्ञापन देखने को मिलेंगे।) सही। (और वह मापदंड क्या है, जिसके आधार पर हम जैसे लोग मास्टरों का चयन कर सकते हैं? और दूसरा यह है, क्योंकि वैसे इतने सारे धर्मों हैं और...) पहले, पहला वाला बोलिए और फिर दूसरा। (ठीक है।) एक-एक करके। लोग ये सब बातें याद नहीं रख पाते, खासकर मैं।

तो, पहला सवाल: मास्टर का चयन कैसे करें? यदि आप थोड़े बहुत प्रबुद्ध हैं, और आप तुरंत समझ जाएँगे कि कौन क्या कह रहा है। और यदि मास्टर स्वयं को सच्चा होने का दावा करते हैं, फिर वे आपको स्वर्ग के (आंतरिक दिव्य) प्रकाश और (आंतरिक दिव्य) ध्वनि या किसी ऐसे दिव्य निवास के कुछ अनुभव दे सकते हैं जहाँ वह मास्टर जा चुके हैं। वह तुरंत ही अपनी कुछ शक्ति आपके साथ साँझा करता है, और इसी को आप एक सच्चा मास्टर कहते हैं। इसके अलावा, सच्चा मास्टर बिना किसी भौतिक साधन, बिना किसी परिवहन के, कहीं भी और कभी भी प्रकट हो सकते हैं। यह दूसरा मानदंड भी है। लेकिन इससे पहले आपको उनके वाणी के अनुसार कोइ मास्टर का चयन करना होगा। क्या यह आपको अपील करता है या नहीं? क्या यह तार्किक है या नहीं? क्या वह पर्याप्त बुद्धिमत्तापूर्ण है या नहीं? क्या यह आपके सभी सवालों के जवाब देता है या नहीं? और मास्टर के सद्गुणों पर गौर कीजिए। क्या मास्टर सचमुच प्रसिद्धि, नाम और इच्छा के बिना हैं? खैर, यह बाहरी है। और फिर आंतरिक वह है कि जब आपको दीक्षा मिल जाएगी, तब आपको पता चलेगा कि मास्टर के पास ईश्वरीय शक्ति है या नहीं। और फिर जब आप अभ्यास करेंगे, तो आप देखेंगे कि मास्टर कहीं भी, कभी भी, आपकी सहायता के लिए प्रकट होंगे। और इसी तरह आप हर दिन अधिकाधिक सीखते जाते हैं। ठीक है (मुझे लगता है कि यह...) क्या वह ठीक है? क्या आपको ऐसा लगता है? क्या आप सहमत हैं? (हाँ, यह उन... से बहुत मिलता-जुलता लगता है बिल्कुल... के समान) अन्यथा, आप मास्टर को कैसे पहचान सकते हैं? यदि वह आपको धन नहीं देता, तो आप यह कैसे मान सकते हैं कि उनके पास धन है? इसलिए, यदि वह प्रबुद्ध है, तो उन्हें आपको (आंतरिक दिव्य) प्रकाश का कुछ अंश प्रदान करना चाहिए। इसका मतलब है कि वह आपको भी आत्मज्ञान प्राप्त कराता है।

(लेकिन कुछ ऐसे हैं… अक्सर लोग अलौकिक शक्ति को लेकर बहुत भ्रमित हो जाते हैं। और इनमें से कई नकली मास्टरों आपको बहुत सी चीजें बताएंगे और बहुत सी चीजें दिखाएंगे, (हाँ।) और आप उनको स्वीकार लेते हैं। और फिर बाद में, जैसा कि आपकी किताब में लिखा है, आप भूतग्रस्त हो जाते है।) हाँ। (और फिर किसी को आना होगा, आप जैसे लोगों को, शायद उन्हें भूत से मुक्त करने के लिए। और आप कैसे उस सूक्ष्म अंतर को पहचान सकते हैं जो एक वास्तविक मास्टर में है, जो (आंतरिक दिव्य) प्रकाश को दिखा सकता है, और दूसरे वाले जो ऐसा नहीं कर सकते?) ओह। साथ ही, मास्टर को पाने के लिए आपको अपने हृदय में झांकना होगा। जब शिष्य तैयार हो जाएगा, तब मास्टर प्रकट होंगे। इसका अर्थ यह है कि जब आपका हृदय सच्चा और पवित्र होगा, तो आपको एक सच्चा और पवित्र मास्टर मिलेगा। इसलिए मास्टर को खोजने के लिए अपने हृदय में झांकें, न कि बाहरी घटनाओं में, न ही अखबारों में छपे विज्ञापनों में। देखे आप क्या चाहते हैं। क्या आप ईश्वर को चाहते हैं या आप चमत्कारिक घटनाओं को चाहते हैं? क्या आप ईश्वर को चाहते हैं या आप लोकातीत शक्ति चाहते हैं? बेशक, अगर हम सचमुच ईश्वर को चाहते हैं, तो हम प्रार्थना करते हैं। यदि आपको यकीन नहीं है, तो आप भगवान से प्रार्थना करते हैं, "मैं आपको नहीं जानती।" कृपया, मुझे केवल आपको ही जानने और केवल आपकी ही पूजा करने दें, और मुझे दूसरों के द्वारा गुमराह न करने दें। ईश्वर आपकी यह अवश्य सुनेगा, और आपको अच्छी मास्टर के पास ले जाएगा। शुद्धता और ईमानदारी ही इस बात की गारंटी है कि आपको एक अच्छा या बुरा मास्टर मिलेगा। क्या आप सहमत नहीं हैं? (जी हाँ।) मास्टर आपके हृदय में विराजमान हैं।

(ठीक है। अब यह दूसरा प्रश्न है।) हाँ। (क्योंकि लोगों के लगावों विभिन्न होते हैं।) हाँ। (और यही कारण है कि बौद्ध धर्म में कई संप्रदायों हैं, साथ ही बौद्ध धर्म के बाहर भी कई धर्म हैं।) सही। (और, आप लोगों को किसी संप्रदाय, जैसे ज़ेन बौद्ध धर्म, तांत्रिक बौद्ध धर्म, शुद्ध भूमि बौद्ध धर्म, तियानताई बौद्ध धर्म या ईसाई धर्म का पालन करने की सलाह कैसे देते हैं? क्या आप यहां के लोगों को कोई सलाह दे सकते हैं?) मैं किसी को भी किसी बात का पालन करने की सलाह नहीं देता। इतने सारे संप्रदायों है उसका कारण यह है कि विभिन्न समयो में अनेक मास्टरों प्रकट हुए। और फिर लोगों ने उस मास्टर का अनुसरण किया और उनके जाने के बाद एक और संप्रदाय की स्थापना की। जब वे जीवित थे, तब उन्होंने किसी भी संप्रदाय की स्थापना नहीं की थी। वह लोगों को वही मानने देता था जो वे मानते थे। और लोगों की पृष्ठभूमि, सामाजिक स्थिति या आस्था, मेरा मतलब है, मूल आस्था में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। क्योंकि मास्टर को पता है कि सभी धर्म एक ही स्रोत से उत्पन्न हुए हैं। किसी प्रबुद्ध मास्टर के इस दुनिया से चले जाने के बाद ही इसकी स्थापना होती है, और लोग उस व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द एकजुट होकर एक और संप्रदाय बना लेते हैं। उदाहरण के लिए, तियानताई संप्रदाय उस मास्टर से संबंधित है जो तियानताई पर्वत पर रहते थे। लिन जिह संप्रदाय का नाम मास्टर लिन जिह के नाम पर रखा गया है। बस इतना ही है। लेकिन मास्टर के चले जाने के बाद, चाहे कोई भी संप्रदाय हो, उसका कोई महत्व नहीं रह जाता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी मास्टर के जरिए आत्मज्ञान प्राप्त किया जाए। चाहे वह मुस्लिम हो, ईसाई हो, बौद्ध हो, तियानताई हो या शिंगोन हो, आप परवाह न करें। क्योंकि मास्टर वैसे भी आपको आपके मूल संप्रदाय के समान चीज सिखाएंगे। लेकिन यह बात आपको आत्मज्ञान प्राप्ति के बाद ही पता चलती है। या शायद आप थोड़े बहुत प्रबुद्ध हैं, और फिर आप इसके प्रभाव को समझते हैं। और बाद में, आप उस मास्टर की शिक्षाओं का अनुसरण करेंगे, और आप स्वयं ही सब कुछ जान लेंगे।

और तब आपको समझ आएगा कि संप्रदायों और धर्मों में कोई अंतर नहीं है। (धन्यवाद।)

(क्या आप ध्यान के बारे में बता सकते हैं? मुझे इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। जैसे कि आप ध्यान करते समय क्या सोचते हैं या...?) इस के बारे में मैं क्या सोचती हूँ? (जी हाँ, या फिर आप क्या कर रहे हैं? आप जानते हैं, (ठीक है।) आप प्रबुद्ध क्यों हैं?) ठीक है, ठीक है। ध्यान एक प्रकार से ईश्वर की सलाह, ईश्वर के निर्देश को सुनना है। अब, सवाल यह है कि हम ध्यान क्यों करते हैं? इसका उद्देश्य आंतरिक संदेश के लिए कुछ समय आरक्षित करना है। चूंकि हम हमेशा कुछ न कुछ मांगते रहते हैं, किसी न किसी चीज के लिए प्रार्थना करते रहते हैं, इसलिए हमें सुनने के लिए भी कुछ समय निकालना चाहिए। जैसे आप मुझसे सवाल पूछते हैं, अब आपको थोड़ी देर चुप रहना होगा और मेरी बात सुनने की कोशिश करनी होगी। क्या यह सच नहीं है? अब हम हर दिन भगवान से प्रार्थना करते हैं, “हे, भगवान, हे बुद्ध। कृपया, मुझे वह दे दीजिए। मुझे बताएं कि क्या करना है! कृपया क्या, कृपया वह…” और फिर हम बाहर जाते हैं, हमेशा व्यस्त रहते हैं, शोर मचाते हैं, बातें करते हैं और कभी सुनते नहीं हैं। तो वास्तव में, ध्यान और कुछ नहीं बल्कि निष्क्रियता की एक प्रक्रिया है।

बस वहीं बैठो और सुनो कि ईश्वर हमारी प्रार्थनाओं का क्या उत्तर देता है, और बुद्ध हमें क्या करने का निर्देश देते हैं। बस इतना ही है। यह बहुत ही सरल बात है। आपने सवाल पूछा, और आपको जवाब चाहिए। अतः, जब हमें किसी उत्तर की आवश्यकता होती है, तो हमें चुप रहना चाहिए और सुनना चाहिए। इसे ही ध्यान कहते हैं, मूल रूप से यह उसी तरह का होता है। (लेकिन क्या आप कुछ शब्दों को दोहराते हैं... या कुछ इस तरह?) आपको कुछ भी दोहराना नहीं चाहिए। लेकिन फिर भी, अधिकांश लोगों की तरह, वे किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ दोहराते हैं। आप वहां बैठिए और हो सकता है कि कल अपने पति के कहे [शब्दों] को आप दोहरायें। या हो सकता है आपको कोई याद आ जाए। या फिर आप अपने व्यवसाय, अपने पैसे, अपनी चिंता या अपनी झुंझलाहट के बारे में सोचें... और इसलिए कभी-कभी मास्टर को लगता है कि आपको शांत करने के लिए, उन अराजक उत्तेजनाओं को दूर करने के लिए, भगवान के कुछ नामों, बुद्धों के कुछ नामों का जाप करने देना उचित है। लेकिन नाम दोहराना आपको ईश्वर के निकट नहीं लाता है। आपकी तीव्र इच्छा, भक्ति और मास्टर से प्राप्त शक्ति, ध्यान में वह सहाय करती है। (धन्यवाद।) और कुछ? (नहीं।) नहीं? अच्छा।

Photo Caption: "दुनिया को कहीं भी रोशन करें"

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