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और अब हमारे पास भारत की आयुषी से हिंदी में एक हार्टलाइन है, बहुभाषी उपशीर्षकों के साथ:मेरी परम सुंदर मास्टर, मेरी गुरु, मेरी परम प्रिय, आपका धन्यवाद। मैं आपसे प्रेम करती हूँ। मास्टर, सदा मेरे साथ रहने के लिए धन्यवाद, और आपको जानने के लिए मुझे समय और अवसर देने के लिए धन्यवाद। आप सदा मेरे साथ थीं; आप हमेशा से मेरे साथ रही हैं। बस मैं ही हूँ जो बार-बार इसे भूल जाती हूँ। मुझे खेद है कि हमारी वजह से आपको इतना कष्ट सहना पड़ता है। मुझे खेद है कि मैं एक अच्छी दीक्षित शिष्या नहीं बन पाई और प्रतिदिन ढाई घंटे क्वान यिन ध्यान नहीं कर पाई। मैं स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास कर रही हूँ। मैं फिर से झूठे वादे नहीं करना चाहती, लेकिन मैं बेहतर बनूँगी। आपके प्रेम, धैर्य और करुणा के लिए धन्यवाद। पुन:र्मिलित तीन परम शक्तियों से मेरी प्रार्थना है कि मेरे मास्टर हमेशा सभी नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रहें, ठीक वैसे ही जैसे वे हमारी रक्षा करती हैं। मेरी यह भी प्रार्थना है कि मैं इतनी धन्य और सौभाग्यशाली रहूँ कि अपने जीवन में कम-से-कम एक बार आपके दर्शन कर सकूँ और मेरे हृदय की यह अभिलाषा पूरी हो सके।मैं एक घटना साझा करना चाहती हूँ। मैं मास्टर का अनुसरण करती थी, लेकिन तब तक दीक्षा लेने के बारे में नहीं सोचा था; मैंने यह बात ईश्वर पर छोड़ दी थी कि यदि मैं तैयार हूँ, तो वे मुझे कोई संकेत दें। पहाड़ों में एक ऐसी जगह है जहाँ मैं अक्सर जाया करती थी, और वहाँ बहुत-से तिब्बती भिक्षु भी रहते हैं। मैं जंगल में अकेली बैठी थी और तभी एक भिक्षु वहाँ से गुज़रा। मैं उनकी भाषा समझ नहीं पाई, लेकिन उनके हाव-भाव से मैंने समझा कि वह मुझे सहारे के लिए एक लकड़ी उठाने और फिर आगे बढ़ने के लिए कह रहे थे। वह मुस्कुराए और वही इशारा दोहराते रहे; फिर मुस्कराकर आगे बढ़ गए। मैं उलझन में पड़ गई, क्योंकि इतने वर्षों में अब तक किसी भी भिक्षु मुझसे बात करने के लिए नहीं रुके थे। फिर मुझे समझ आया कि यह मेरा संकेत था और ईश्वर मुझे बता रहे थे कि मैं अकेले आगे नहीं बढ़ पाऊँगी; मुझे मास्टर के सहारे की आवश्यकता थी। उस क्षण मैंने स्वयं को बहुत धन्य और सुरक्षित महसूस किया और दीक्षा के लिए आवेदन करने का निर्णय लिया। दीक्षा से एक दिन पहले, मैंने फिर स्वयं से प्रश्न किया कि क्या मैं सही कर रही हूँ। मैं बहुत बेचैन महसूस कर रही थी। लेकिन दीक्षा के दिन, मैंने अपने भीतर आनंद, स्वतंत्रता, आशीर्वाद और बहुत हल्केपन का अनुभव किया। धन्यवाद, मास्टर। आप प्रेम हैं, आप प्रकाश हैं, और आप हमारी सहायता करती हैं तथा हमें स्वयं को बेहतर बनाने की प्रेरणा देती हैं। सदैव आपकी, भारत से आयुषीविश्वास से परिपूर्ण आयुषी, आपकी हार्टलाइन के लिए धन्यवाद।गुरुवर आपको यह जवाब भेजतें है: “ईमानदार आयुषी, इस संसार में आध्यात्मिक साधना करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण है, इसलिए स्वयं को दोषी न ठहराएँ। हर दिन स्वयं को सँभालें और फिर से शुरुआत करें। यह जानें कि आपको असीम प्रेम मिल रहा है, जीवन में आपके प्रदर्शन के आधार पर नहीं, बल्कि इसलिए कि आप सर्वशक्तिमान ईश्वर के संतान हैं, और वे कल्पना से परे परम कृपालु तथा प्रेममय मापा हैं। इसे हृदय में आत्मसात करें और अपनी यात्रा में इससे शक्ति पाएँ, ताकि इस विश्वास के साथ सभी बाधाएँ पार किए जा सकें कि परम ईश्वर की महानता के सामने वे केवल छोटे-मोटे भ्रम हैं। आप खुद को जितना मज़बूत समझते हैं, उससे कहीं अधिक मज़बूत हैं। पूर्ण निष्ठा से इस मार्ग पर आगे बढ़ती रहें, और बाकि सब परमेश्वर सँभाल लेंगे। आप और भारत के मनोहर लोग अपने भीतर के दिव्य प्रकाश के प्रति जागृत हों और सदा प्रेम बनकर जिएँ। मेरा प्रेम वह दीपक है, जो घर वापसी की आपकी यात्रा का मार्ग प्रकाशित करता है!”











